History Of Islam In Hindi

  

इस्लाम का इतिहास 

History Of Islam In Hindi
History Of Islam In Hindi 


पैगम्बर साहब से पहले अरब का समाज 

'ऐयामे - जाहिलिया' 

हज़रत मोहम्मद साहब के पैगम्बर होने से पहले इस्लामी कानून का कोई अस्तित्व नहीं था और अरब - निवासी जातियों की कोई सामान्य विधि नहीं थी । वे कबीलों में बंटे हुए थे । प्रत्येक कबीले का एक मुखिया (Chief) या सरदार हुआ करता था, जिसका चुनाव प्रायः साहस, ज्ञान और कुलीनता (High decent) के आधार पर किया जाता था। प्रत्येक कबीले का अपना निजी कानून होता था और झगड़े मुखिया या तलवार द्वारा तय किए जाते थे। अरब के कबीलों में आपस में युद्ध हुआ करते थे। अरब में मूर्ति पूजा का प्रचलन था, बहुविवाह हुआ करते थे तथा अरब समाज खानाबदोश (घरहीन तथा भ्रमणशील) था।

अरब में लोगों के दो वर्ग थे - प्रथम वर्ग उन लोगों का था जो रेगिस्तानी खानाबदोश थे, और बद्दू (Beduins) के नाम से जाने जाते थे, दूसरा वर्ग शहर के निवासियों का था जो मुख्यतः व्यापारी थे तथा व्यवस्थित जीवन व्यतीत करते थे। किन्तु, किसी वर्ग के समाज में व्यवस्थित विधि प्रशासन का अस्तित्व नहीं था।

 संक्षेप में, अरबों का सामाजिक जीवन अपने कबीले के नियमों तथा दूसरे कबीलों के भय, दवाब तथा व्यवहार से व्यवस्थित होता था, कबीलों में प्रायः पारस्परिक युद्ध हुआ करते थे। एक कबीले के सदस्य दूसरे कबीले के सदस्य को जान से मार देते थे। यदि किसी कबीले का कोई आदमी दूसरे कबीले के किसी सदस्य द्वारा मार दिया जाता था तो दूसरे कबीले का मुखिया अपराधी को समर्पण के लिए कहता था, जिससे हत्या का दण्ड दिया जा सके। 

बालिकाओं की हत्या भी साधारण बात थी। स्त्रियों को कानूनी अधिकार प्रदान नहीं किए गए थे और उन्हें वस्तुतः पशुओं की तरह संपत्ति ही समझा जाता था। पुरुष का व्यवहार भी उनके प्रति कदाचित् ही मानवीय होता था। नियमित विवाह उस समाज में अज्ञात थे। तत्कालीन अरब समाज में पुरुष एवं महिलाओं के मध्य कुछ ऐसे अनैतिक सम्बन्ध प्रचलित थे जिन्हें वास्तविक अर्थों में वैवाहिक सम्बन्ध का दर्जा नहीं दिया जा सकता। इस्लाम के प्रारंभ में मुता (अस्थायी विवाह) का प्रचलन था जिसे पैगम्बर मुहम्मद साहब ने भी सहन किया, लेकिन बाद में पैगम्बर साहब ने मुता को निषिद्ध घोषित कर दिया।

 मेहर विवाह के लिए आवश्यक तो था लेकिन पत्नी को न मिलकर पत्नी के पिता या भाई या उसके किसी संरक्षक को दिया जाता था। पत्नी विवाह की संविदा में स्वतंत्र पक्षकार नहीं होती थी। बालिकाओं का क्रय - विक्रय हुआ करता था और उनके संरक्षक उनकी सहमति के बिना और उनकी इच्छा के विरुद्ध उनका विवाह किसी भी व्यक्ति के साथ कर सकते थे । 

उत्तराधिकारी से स्त्रियां अपवर्जित (वंचित) थीं और पुरुष उत्तराधिकारियों में भी केवल पुत्र, अन्य किसी भी संबंधी को, चाहे वह कितना ही निकटस्थ हो, उत्तराधिकार से संपत्ति नहीं मिलती थी। अरब निवासी स्वतंत्रता प्रेमी थे और साथ - साथ साहसी भी थे।

    ऐसे अव्यवस्थित समाज में पैगम्बर मुहम्मद साहब समाज सुधारक के रूप में आये और लोगों में इस्लाम धर्म का प्रचार किया। 

-मुस्लिम विधि का जन्म इस्लाम के अभ्युदय से हुआ। 

     अरबी समाज की इस दशा में इस्लाम ने सुधार किया और समाज कि काया पलट दी। स्वयं अरब वालों ने इस परिवर्तन का इतना बोध किया कि वे मुहम्मद साहब के इस दुनिया में तशरीफ़ लाने के पहले के समय को "ऐयाम - इल - जाहिलिया" अर्थात् ' अज्ञान का काल ' कहने लगे। 


इस्लाम का इतिहास 

पैगम्बर और इस्लाम का अभ्युदय 

ऐसा कहा जाता है कि पैगम्बर मोहम्मद साहब मक्का में सन् 570 ईस्वी में पैदा हुए। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला और मां का नाम आमिना था।  उनके जन्म के पूर्व ही उनके पिता की मृत्यु हो गयी और छः वर्ष की बाल्यावस्था में ही उनकी मांं का भी देहावसान हो गया। मां की मृत्यु के पश्चात् उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने उनका पालन - पोषण किया। परन्तु दो वर्ष पश्चात् उनके पितामह (दादा) की भी मृत्यु हो गयी तत्पश्चात् उनका लालन - पालन उनके चाचा अबू तालिब ने किया। 

बचपन से ही मोहम्मद साहब गंभीर स्वभाव के व्यक्ति थे और अपना अधिकांश समय चिंतन में ही लगाया करते थे। पच्चीस साल की उम्र के बाद उन्होंने अपना अधिक समय 'हिरा' नाम की एक गुफा में एकांतवास में बिताना शुरू किया, जहां वे प्रार्थना और चिंतन में लगे रहे और चालीस साल की उम्र में उन्हें ईश्वरीय संदेश (वह्य) या (वही) मिलना प्रारंभ हो गया अर्थात् वे पैगम्बर हो गये। तभी से उन्होंने अपने कबीले के लोगों के बीच में जाकर धार्मिक प्रचार करना आरंभ कर दिया। 

हज़रत मोहम्मद साहब का मक्का से मदीना चले जाना (अर्थात् हिजरत) 

सन् 622 ईस्वी में मोहम्मद साहब मक्का से मदीना चले गये। मोहम्मद साहब का मक्का से चले जाना ही "हिजरत" कहलाता है। सन् 622 ईस्वी से मुस्लिम युग (हिजरी संवत्) का आरंभ हुआ। मदीना में उनके उपदेशों से लोग काफी प्रभावित हुए और उनके अनुयायियों की संख्या नित्यप्रति बढ़ती गयी। अब अनादर, आभासी असफलता और अपूर्ण भविष्यवाणी के तेरह वर्ष समाप्त हुए और सफलता के दस वर्ष आरंभ हुए। पैगम्बर साहब के धर्म प्रचार की कथा में हिजरत एक स्पष्ट विभाजक है। हिजरत के पूर्व तक वे एक प्रचारक मात्रा थे, पर उसके बाद वे एक राज्य के शासक हो गये, जो दस वर्ष में अरब का साम्राज्य हो गया। पैगम्बर मोहम्मद के व्यक्तित्व का प्रभाव अरबवासियों पर इतना अधिक पड़ा कि थोड़े समय में अधिकांश अरबवासियों ने इस्लाम - धर्म ग्रहण कर लिया। पैगम्बर साहब की मृत्यु सन् 632 ईस्वी में हुई। 

इस्लाम क्या है ? 

पैगम्बर साहब के कथनानुसार वाणी की निर्मलता और आतिथ्य (Hospitality) ही इस्लाम है, धैर्य और नेकी ही दीन या आस्था (Faith) है।

 "नेकी से सुख और बदी से दुख "

का बोध ही दीन का लक्षण है तथा

 "जिस कार्य को करने में अपने हि चित्त को चोट पहुंचे वही पाप है।" 

इस्लाम और उसका अर्थ (Islam and its significance) 

धार्मिक भाव में इस्लाम से तात्पर्य अल्लाह की इच्छा के लिये आत्मसमर्पण कर देना है और निरपेक्ष भाव में इस्लाम का अर्थ शांति की स्थापना है। ' सलामा ' धातु ' जिससे ' इस्लाम ' शब्द बना है, का तात्पर्य है धैर्य रखना, विश्रांत रहना, अपना कर्तव्य पालन करना, ऋणों का भुगतान करना, पूर्णतया अक्षुब्ध रहना और परम मित्र को अपने को समर्पित कर देना। इस्लाम का अर्थ होता है - शांतिअभिवादन (Greeting), सुरक्षा और मोक्ष (Salvation) । 

इस्लाम के उपदेश (The Teaching of Islam) 

कुरान के उपदेश यह स्पष्ट करते हैं कि इस्लाम संसार के आरंभ से अस्तित्व में है और प्रलय (क़यामत) के दिन तक इसका अस्तित्व रहेगा । पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब धर्म को मनुष्य द्वारा पालन योग्य एक सीधा और स्वाभाविक कानून समझते थे, जिसमें कि कोई पेचीदगी या संदिग्धता नहीं थी। इस्लाम में इंसानों के बंधुत्व की भावना है। इस्लाम की यह मान्यता है कि अल्लाह ने ही सबको पैदा किया है। वह सब को बराबर समझता है। इंसान के स्वार्थ से उत्पन्न सांप्रदायिक भावना और अन्य अवरोध दूर कर दिए गए हैं और धर्म के आधार पर तकसीमें उचित नहीं माने जाते हैं और धर्म की शिक्षा हर प्रकार के गुटबंदी के विरुद्ध है। पैगम्बर मोहम्मद साहब ने लोगों को बताया कि श्रेष्ठता कर्म में रहती है। इस प्रकार एक मुसलमान के लिए जीवन का अंतिम उद्देश्य प्राप्त करने के संघर्ष में यह बड़ा संसार सहकारिता के लिए महान क्षेत्र है।

    इस्लाम प्रथमतः कर्तव्यशीलता का मजहब है। मानव - सेवा और परोपकार ही विशेष रूप से अल्लाह की सेवा और उपासना है। 

जो इंसान पर मेहरबानी नहीं करता, उस पर अल्लाह भी मेहरबानी नहीं करेगा।  

हज़रत मोहम्मद साहब के देहावसान (परदा करने) के बाद 

मोहम्मद साहब की मृत्यु के बाद खिलाफत (खलीफा पद) के लिए कई उम्मीदवार हुए, जिसकी वजह से जनता कई परस्पर - विरोधी दलों में बंट गई। परन्तु ऐसा होते हुए भी प्राधिकृत लोगों ने "सुन्नत" और "हदीस" को हाथों - हांथ सुरक्षित रखा और "कुरान" में उल्लेखित सांसारिक और आध्यात्मिक दोनो प्रकार के विषयों से संबद्ध प्रश्नों पर उनका प्रयोग किया । यद्यपि "सुन्नत" और "हदीस" तब तक अभिलेखबद्घ (Recorded) नहीं किए गये थे, तो भी समय - समय पर विवादों को हल करने और पैगम्बर साहब द्वारा वर्जित कार्यों को करने से लोगों को रोकने के लिए उनके उत्तरजीवी साक्षियों द्वारा उनका हवाला दिया जाता था और समय बीतने पर वे न्यायिक अवधारणा (Judicial determination) के प्रमाण बन गये। 

  यद्यपि सभी मुसलमान कुरान को अल्लाह का कलाम (ईश्वर की वाणी) मानते हैं, तो भी भिन्न टीकाकारों द्वारा उसके सारवान् भागों के विरोधी निर्वचनों, निष्ठा (Faith) के नियमों के सिद्धांतों के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद हैं और कुछ उलेमाओं द्वारा किसी विशेष हदीस के स्वीकार या अस्वीकार करने के कारण या किसी विशेष मनुष्य के इमाम होने से मतभेद की वजह से भिन्न सिद्धांतों और भिन्न संप्रदायों का अभ्युदय हुआ। मुसलमानों में दो प्रमुख संप्रदाय शिया और सुन्नी हैं, जिनमें से प्रत्येक की भी कई उपशाखायें हैं, जिनका विस्तृत विवेचन हम आगे कभी, हमारे आनी वाली अगली पोस्ट में करेंगे । 

- "इतने फिरकों के होते हुए भी मुसलमानों में कोई जाति - भेद नहीं है।"


खिलाफत 

पैगम्बर मोहम्मद साहब का देहावसान सन्  632 ईस्वी में हुआ। उनके कोई पुत्र नहीं थे। उनके देहावसान (परदा करने) के पश्चात् उत्तराधिकारी के प्रश्नों को लेकर मुस्लिम समुदाय के लोग दो गुटों में विभक्त हो गए। एक गुट का नेतृत्व पैगम्बर साहब की पुत्री फातिमा कर रही थीं। इस गुट (जो कि शिया शाखा कहलाता है) का मत था कि पैगम्बर साहब का उत्तराधिकारी उनके परिवार के किसी व्यक्ति को होना चाहिए और इसीलिए पैगम्बर साहब के दामाद (फातिमा के पति) और उनके चचेरे भाई "खलीफा" पद के हकदार हैं। दूसरे गुट (सुन्नी गुट) के अनुसार मोहम्मद साहब के उत्तराधिकारी (खलीफा) का निर्वाचन चुनाव द्वारा होना चाहिए। बहुसंख्यक मुस्लिम इस गुट के समर्थक थे। अबू बक्र, जो हज़रत आयशा (पैगम्बर मोहम्मद साहब की पत्नी थीके पिता थेप्रथम खलीफा हुए। परन्तु दो वर्ष पश्चात् सन् 634 ईस्वी में इनकी मृत्यु हो गयी, तत्पश्चात् उमर दूसरे खलीफा निर्वाचित किए गए। सन् 644 ईस्वी में इनकी हत्या कर दी गई। तत्पश्चात् उस्मान तीसरे खलीफा के रूप में चुने गए। सन् 656 ईस्वी में इनकी भी हत्या कर दी गयी। तब अली, जो कि मोहम्मद साहब की पुत्री फातिमा के पति थे खलीफा हुए। अली की हत्या भी सन् 661 में हो गयी और उनका स्थान उनके पुत्र हसन ने ग्रहण किया। हसन ने दमिश्क के  एक अनुचित अधिकारी मुआविया के पक्ष में अपने पद से इस्तीफा दे दिया, फिर भी उनकी हत्या कर दी गई। अली के समर्थकों ने हसन के भाई हुसैन को मुआविया के पुत्र यजीद के प्रति विद्रोह करने के लिए सहमत किया, लेकिन फिर भी कर्बला के मैदान में विश्वासघाती व्यक्तियों के द्वारा बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हो गए।

उम्मैयद (ओमोदिया) राजघराना ( Umaiyad's Dynasty) 

मोआविया ने उम्मैयद (ओमेदिया) राजघराना स्थापित किया, जिसने दमिश्क में सन् 661 ईस्वी से 750 ईस्वी तक शासन किया। दमिश्क को राजधानी बनाया गया। इस प्रकार उमैय्यद वंश ने शासन किया तथा खिलाफत बादशाहत में परिवर्तित हो गई। उमैय्यद वंश के हाथों में शासन आने के कारण शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना हुई। मक्का और मदीना के लोग ईश्वर विद्या तथा विधिशास्त्र की रचना कर रहे थे, फलस्वरूप मक्का और मदीनाइस्लामी कानून और विधिशास्त्र की रचना कर रहे थे, फलस्वरूप मक्का और मदीनाइस्लामी कानून और विधिशास्त्र के केंद्र बने। 

अब्बासी राजघराना (Abbasi Dynasty) 


उम्मैयदों के बाद अब्बासियों ने बगदाद को अपनी राजधानी बनाकर कई वर्षों तक शासन करके अंत में सन् 1517 ईस्वी में टर्कों के सुल्तान सालेम प्रथम के पक्ष में गद्दी छोड़ दी। 

उस्मानी राजघराना (Ottoman Dynasty) 


सन् 1538 ईश्वी में तुर्किया (तुर्की) के सुल्तान ने खलीफा की पदवी ग्रहण की। सन् 1924 इश्वी में मुस्तफा कमाल पाशा के द्वारा खलीफा की पदवी समाप्त कर दी गई। 

भारत में मुस्लिम शासनकाल 

मुस्लिम शासन काल में इस्लामी कानून ही भारत का कानून था और वैयक्तिक कानून (Personal Law) को छोड़कर इसके सभी प्रावधान, जैसे संविदा विधिदांडिक विधिअपकृत्य विधि आदि हिन्दुओं और मुसलमानों पर एक समान लागू होते थे। मुगल शासन काल में भारत में हनफी इस्लामी विधि लागू रही जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के दौरान क्रमशः समाप्त हुई। यद्यपि इस्लामिक दांडिक विधि कुछ आगे तक चली किन्तु यह दांडिक विधि सन् 1860 में भारतीय दण्ड संहिता के अधिनियम के साथ समाप्त हो गई। 

अंग्रेजों के समय एवं उसके बाद 

भारत में सन् 1772 के विनिमय (Regulation) संख्या 11, धारा 27 के द्वारा यह अधिनियम किया गया है कि दाय (Inheritance), उत्तराधिकार (Succession), विवाह और जातीय तथा अन्य धार्मिक रिवाजों और संस्थाओं से सम्बन्ध रखने वाले सब मामलों में मुसलमानों के ऊपर कुरान की विधियां और हिन्दुओं के ऊपर शास्त्र की विधियां लागू की जाएंगी। कम्पनी के विनियमों द्वारा समय - समय पर संशोधित मुस्लिम दण्ड विधि केवल मुसलमानों पर ही नहीं बल्कि अंग्रेजी साम्राज्य में भारत वर्ष के सब धर्मावलंबियों पर भी लागू की गई। अन्य मामलों, जैसे संविदा आदि न्यायाधीशों के सद्विवेक पर छोड़ दिए गए जिसे न्यायसाम्य और सद्विवेक नाम दिया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक भारत में सभी इस्लामी लोक कानून अधिनियमों द्वारा समाप्त कर दिए गए और केवल मुसलमानों पर ही अनुप्रयोग वैयक्तिक इस्लामी कानून ही बचा। 


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